अगर आप किसी विदेशी पर्यटक से पूछेंगे कि इंडिया में सबसे यादगार चीज़ क्या थी, तो जवाब हो सकता है – “That auto guy who charged me 1000 rupees for 2 km!” और अगर उन्होंने गाइड हायर किया हो तो शायद वो बोले – “The guide who showed me his cousin’s jewellery shop instead of the fort.”
जी हां, ये स्कैम अब नया नहीं रहा, बल्कि एक तय स्क्रिप्ट की तरह चलता है। पर्यटक आते हैं, एयरपोर्ट से निकलते हैं, और फिर शुरू होता है एक स्कैम शो – जिसमें किरदार तय हैं, डायलॉग तय हैं, और अंत में बेवकूफ बना टूरिस्ट तय है।
चाहे दिल्ली का लाल किला हो या आगरा का ताजमहल – नकली गाइड, नकली टिकट और ओवरचार्जिंग ऑटो वहां पहले से मौजूद रहते हैं। जैसे ही कोई विदेशी चेहरे वाला इंसान दिखा, सब एक्टिव हो जाते हैं – “हैलो सर! ऑफिशियल गाइड हूं, आपको सस्ता टूर कराऊंगा।”
नकली गाइड – ‘पढ़ा नहीं हूं, पर रटा हुआ है!’
भारतीय पर्यटन स्थलों पर आपको ऐसे गाइड मिलेंगे जो ASI द्वारा अधिकृत नहीं होते, पर बोलते हैं जैसे इतिहास के प्रोफेसर हों। ये गाइड्स पर्यटक को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे “ऑथराइज्ड” हैं, और उनका ID कार्ड सिर्फ घर पर भूल गए हैं।
अब होता क्या है? टूरिस्ट उनके साथ जाता है, वे थोड़ा-बहुत इंटरनेट से रटी हुई जानकारी सुनाते हैं, और फिर रास्ते में ले जाते हैं – “सर, ये मेरी फैमिली की दुकान है, एक बार देख लीजिए।” और देखिए, आप ऐतिहासिक गेट के बजाए सिल्क स्टॉल पर खड़े हैं।
इन नकली गाइड्स का मकसद सिर्फ कमीशन बनाना होता है, टूर का मज़ा बिगाड़ना उनका साइड इफेक्ट है। और जब टूरिस्ट को अंदाज़ा होता है कि कुछ गड़बड़ है, तब तक ₹1500-₹2000 हाथ से निकल चुके होते हैं।
टिकट भी नकली, और पुलिस को भनक नहीं?
ये सुनकर आपको हैरानी होगी कि कुछ जगहों पर नकली टिकट बेचने का भी धंधा चलता है – खासकर उन पर्यटक स्थलों पर जहां लंबी कतारें लगती हैं। स्कैमर्स विदेशी पर्यटकों को कहते हैं – “सर, आपको लाइन में नहीं लगना पड़ेगा, हमारे पास प्राइवेट टिकट हैं।” और बेच देते हैं एक प्रिंटेड नकली टिकट – असली कीमत ₹50, लेकिन बिकता ₹300 में।
असली दुख की बात ये है कि कई बार ये सब पुलिस और प्रशासन की नज़रों के सामने होता है, मगर कार्रवाई नाम की चीज़ नहीं होती। टूरिस्ट अगर पकड़ा जाए तो गार्ड कहता है – “यह फर्जी टिकट है, बाहर जाइए।” और बेचारा विदेशी टूरिस्ट शर्मिंदा होकर सोचता है – “It’s not Incredible India… it’s Unbelievable India!”
ऑटोवाला: “सर, मीटर खराब है… लेकिन मेरा दिमाग तेज़ है”
अब बात करते हैं उस किरदार की जिसे भारत का हर टूरिस्ट याद रखता है – ऑटोवाला भाईसाहब। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही एक से बढ़कर एक ऑफर मिलते हैं – “सर, ताजमहल ₹1000 में, पूरा घूमकर।” और जब आप कहते हैं “Google Map तो 3 km बता रहा है,” तब जवाब आता है – “सर, रूट अलग है, GPS गलत दिखाता है।”
ये ओवरचार्जिंग स्क्रिप्ट में मीटर नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं। मीटर कभी “खराब” होता है, कभी “काम नहीं कर रहा” होता है, और कभी “लगाने की ज़रूरत नहीं” होती है। टूरिस्ट मन ही मन सोचता है – “Maybe I should’ve walked instead.”
कुछ मामलों में तो टूरिस्ट को पहले सस्ते रेट पर बैठाया जाता है, फिर रास्ते में कह दिया जाता है – “सर, ये डिस्टेंस एक्स्ट्रा है, ₹500 और देने पड़ेंगे।” और बेचारा टूरिस्ट, डर के मारे, ज्यादा पैसे देकर उतर जाता है।
भारत का ब्रांड बिगाड़ रहे हैं ये स्क्रिप्ट वाले कलाकार
अब सवाल ये है कि इन सबका असर कहां पड़ता है? जवाब है – सीधे भारत की वैश्विक छवि पर। जब विदेशी लोग अपने देश जाकर बताते हैं कि कैसे उन्हें गाइड ने ठगा, या ऑटोवाले ने लूटा, तो भारत की साख खराब होती है।
Travel blogs, Reddit threads, YouTube व्लॉग्स – इन सब पर ऐसे अनुभव पोस्ट होते हैं, जो बाकी पर्यटकों को भारत आने से पहले डराते हैं। और असली दुख की बात ये है कि बहुत बार प्रशासन या पुलिस को भी पता होता है, लेकिन वे इस “स्क्रिप्ट” का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
जब शिकायत करना हो फॉर्मेलिटी!
भारत में घूमने आए पर्यटक जब किसी घोटाले का शिकार होते हैं, तो पहली उम्मीद होती है पुलिस से मदद। मगर जैसे ही वे शिकायत करने थाने जाते हैं, एक ठंडी हवा सी चलती है — “हां-हां लिखवा दीजिए, देखते हैं कुछ हो सकता है।” लेकिन असल में कुछ होता नहीं। आपकी शिकायत फाइल में रखी जाती है, फिर उसपर धूल जम जाती है, और फिर वह इतिहास बन जाती है।
हर साल हजारों विदेशी पर्यटक दिल्ली, आगरा, जयपुर, वाराणसी जैसे शहरों में स्कैम्स का शिकार होते हैं। कभी नकली गाइड, कभी ओवरचार्जिंग, तो कभी होटल के नाम पर ठगी। और जब वे हिम्मत कर शिकायत करते हैं, तो उन्हें प्रक्रिया में उलझा दिया जाता है। “साहब अभी मीटिंग में हैं”, “FIR लिखने वाला अभी छुट्टी पर है”, “ये लोकल केस नहीं है” — ये सब सुन-सुनकर ही टूरिस्ट का भरोसा उठ जाता है।
शिकायत लिखी गई, अब आगे क्या?
मान लीजिए किसी विदेशी पर्यटक ने हिम्मत जुटाकर थाने जाकर शिकायत दर्ज करा भी दी। अब आप सोचेंगे कि पुलिस दौड़ेगी, दोषी को पकड़ेगी, और न्याय दिलवाएगी। लेकिन नहीं! अब शुरू होता है एक नया खेल – “जांच जारी है।”
कई मामलों में पुलिस FIR तो दर्ज कर लेती है, लेकिन कार्रवाई नहीं करती। न घोटालेबाज़ को बुलाया जाता है, न पूछताछ होती है, और न ही पैसा वापस दिलवाया जाता है। टूरिस्ट एक-दो दिन इंतज़ार करता है, फिर बोर होकर चुपचाप अपने देश लौट जाता है। उसके बाद वह भारत यात्रा का कड़वा अनुभव फेसबुक और ट्रिपएडवाइज़र पर डाल देता है – और फिर बाकी पर्यटक सतर्क हो जाते हैं।
एक रशियन टूरिस्ट ने बनारस में एक गाइड के खिलाफ ₹5000 की ठगी की शिकायत की। पुलिस ने कहा – “कल आइए, साहब नहीं हैं।” फिर तीसरे दिन बोले – “सीसीटीवी नहीं है, कुछ कर नहीं सकते।” अब बताइए, ये क्या मज़ाक है?
मिलीभगत की बू आती है
कई बार ऐसा लगता है कि स्थानीय स्कैमर्स और पुलिस के बीच एक अनकहा समझौता होता है। जैसे दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है। स्कैमर टूरिस्ट से पैसा ऐंठता है, और पुलिस आँख मूँद लेती है। कभी-कभी तो सुनने में आता है कि कुछ पुलिसवाले खुद भी इन ठगों से कमीशन पाते हैं।
आपने अगर किसी ऑटो वाले को ₹100 के बदले ₹500 लेते देखा और टूरिस्ट ने पुलिस को बुलाया, तो पुलिसवाला क्या करता है? वो मुस्कुराकर कहता है – “भैया, टूरिस्ट लोग तो ऐसे ही होते हैं, पैसे हैं तो देंगे ही।” और मामला वहीं सुलट जाता है।
जब विदेशी सैलानी पुलिस की ऐसी प्रतिक्रिया देखते हैं, तो वे सोचते हैं – “हम भारत घूमने आए थे या मूर्ख बनने?” और यही बात वे अपने व्लॉग्स, ट्रैवल रिव्यू और दोस्तों से बातचीत में बार-बार बताते हैं।
आखिर नुकसान किसका हो रहा है?
आप सोचिए, ये सब देखकर भारत की छवि क्या बनती है? विदेशी मीडिया में खबरें आती हैं कि “भारत घूमने गए, पर पुलिस ने भी मदद नहीं की।” इससे टूरिज्म इंडस्ट्री को करोड़ों का नुकसान होता है। न सिर्फ विदेशी सैलानी डरते हैं, बल्कि भारत आने की प्लानिंग ही कैंसिल कर देते हैं।
सरकारें टूरिज़्म बढ़ाने के लिए ‘अतिथि देवो भव:’ जैसे कैंपेन चलाती हैं, करोड़ों का बजट लगाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में बदलाव नहीं दिखता। जब तक पुलिस सिस्टम जवाबदेह नहीं बनेगा, तब तक कोई विज्ञापन भारत की छवि नहीं सुधार सकता।
हल निकल सकता है, बस चाहत चाहिए
अब बात सिर्फ शिकायत दर्ज करने की नहीं है, बात है उस पर ईमानदारी से कार्रवाई करने की। ज़रूरत है कि टूरिस्ट पुलिस को अच्छी ट्रेनिंग दी जाए। उन्हें इंग्लिश बोलनी आनी चाहिए, उन्हें संवेदनशील होना चाहिए, और सबसे जरूरी – उन्हें ईमानदार होना चाहिए।
डिजिटल शिकायत सिस्टम, ट्रैकिंग नंबर, समय सीमा में समाधान – ये सब होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात – टूरिस्ट को लगना चाहिए कि पुलिस उसके साथ है, न कि स्कैमस्टर के साथ।
चायवाले से ज़्यादा जान-पहचान वाले स्कैमर!
आपने अक्सर देखा होगा कि जैसे ही कोई विदेशी टूरिस्ट किसी भी टूरिस्ट स्पॉट पर पहुंचता है, वहां कुछ लोग तुरंत एक्टिव हो जाते हैं। कोई कहता है “सर, ऑफिशियल गाइड हूं,” कोई कहता है “सर, ये मेरी फैमिली की दुकान है,” और कोई कहता है “सर, इस रास्ते से मत जाइए, सीधा रॉयल शॉपिंग एक्सपीरियंस करिए।” और मज़ेदार बात ये है कि इन सबको देखकर पास खड़े पुलिसवाले भी मुस्कुरा देते हैं, जैसे कह रहे हों – “चलो, आज का शो शुरू हुआ!”
कभी आपने सोचा है – ये स्कैमर हर जगह कैसे मौजूद रहते हैं? क्या ये सिर्फ किस्मत है, या सिस्टम के भीतर कहीं कुछ गड़बड़ है?
कई टूरिस्टों ने खुलकर कहा है – “हमें लग रहा था जैसे पुलिस और स्कैमर एक टीम में हैं।”
स्कैमर पुलिस से क्यों नहीं डरते?
एक आम इंसान अगर सड़क पर कुछ बेचने लगे तो तुरंत पुलिस आकर उसे हटाने को कहती है। लेकिन स्कैमर्स? वो बड़े आराम से खड़े होते हैं, और यहां तक कि किसी दुकान के बाहर पुलिसवाले के साथ हँसते-बतियाते भी दिख जाते हैं।
क्या ये सिर्फ संयोग है कि वो पुलिस को देखकर डरते नहीं? या ये कोई ‘अंदर की सेटिंग’ का कमाल है?
टूरिस्ट कई बार पुलिस से जाकर कहते हैं – “वो गाइड नकली है, उसने हमें गलत जगह घुमाया।” जवाब आता है – “आपने सबूत लाया है?”
अब बताइए, एक टूरिस्ट क्या हर समय कैमरा ऑन करके चले?
यहां तक कि कई बार पुलिस खुद भी कहती है – “वो तो यहां रोज खड़ा होता है, सब जान-पहचान वाले हैं।”
अब इस तरह का जवाब सुनकर कोई भी सोच सकता है कि स्कैमर्स को “लोकल प्रोटेक्शन” मिला हुआ है।
सेटिंग का खेल: होटल, दुकान और गाइड – सब एक नेटवर्क
आपको जानकर हैरानी होगी कि स्कैमर केवल अकेले काम नहीं करते, बल्कि एक पूरा नेटवर्क होता है।
गाइड आपको एक खास दुकान पर ले जाएगा। वहां के शॉपकीपर कहेंगे – “सर, ये हैं हमारे बेस्ट आइटम्स।”
आप मोलभाव करेंगे, और फिर पता चलेगा – सामान की असली कीमत ₹500 थी, आपने ₹2500 दे दिए।
गाइड को 20% कमीशन मिल जाता है। दुकानवाले खुश। टूरिस्ट बेवकूफ। और पुलिस? उन्हें तो इस नाटक का टिकट मुफ्त में मिला है।
कई बार होटल स्टाफ भी इस सेटिंग का हिस्सा होते हैं – “सर, हमारे गाइड बहुत अच्छे हैं, आप इनके साथ जाइए।”
और फिर वही स्क्रिप्ट – वही झूठ, वही शॉप, वही ठगी।
पुलिस की भूमिका: मूक दर्शक या मूक सहभागी?
पुलिस की भूमिका इस पूरे खेल में बहुत दिलचस्प होती है।
जब टूरिस्ट परेशान होता है, शिकायत करता है, तब पुलिस कहती है – “हम देखेंगे।”
लेकिन फिर कुछ नहीं होता।
ये चुप्पी संदेह पैदा करती है – क्या पुलिस जानबूझकर इन स्कैमर्स को नहीं छेड़ती?
क्या उन्हें डर है कि कहीं उनकी भी पोल न खुल जाए?
टूरिस्ट पुलिस से उम्मीद करता है कि वह उसे सुरक्षित महसूस कराएगी।
लेकिन जब पुलिस खुद उन्हें डाँटने के बजाय पहचान कर छोड़ देती है, तो ये भरोसे की दीवार ढह जाती है।
कई टूरिस्ट कह चुके हैं – “India has beauty, culture, but no safety from scams.”
सोचिए, जब ये बात इंटरनेशनल मीडिया में छपती है, तो भारत की छवि को कितना नुकसान होता है?
समाधान: भरोसा लौटाना होगा, स्कैम हटाना होगा
अब समय आ गया है कि प्रशासन और पुलिस मिलकर इस चुप्पी को तोड़े।
हर टूरिस्ट स्पॉट पर एक विज़िटर हेल्प डेस्क, डिजिटल गाइडिंग सिस्टम, और स्कैम वॉच कैमरा होना चाहिए।
पुलिस को ट्रेनिंग दी जानी चाहिए – टूरिस्ट फ्रेंडली कैसे बना जाए, और स्कैम से सख्ती से कैसे निपटा जाए।
साथ ही, गाइड और दुकानों की लिस्ट ऑनलाइन होनी चाहिए ताकि कोई फर्जी बनकर टूरिस्ट का भरोसा न तोड़ सके।
अगर भारत को टूरिज्म से असली विकास चाहिए, तो स्कैमर्स को नहीं, टूरिस्ट को सुरक्षा देनी होगी।
दुनिया कहती थी – “Incredible India”… अब कहती है “Insecure India”?
भारत एक समय में विश्व पर्यटन मानचित्र पर भरोसे का नाम हुआ करता था।
संस्कृति, विविधता, इतिहास और आतिथ्य – ये सब कुछ हमें एक पॉजिटिव पहचान दिलाते थे।
लेकिन अब?
अब विदेशी टूरिस्ट आने से पहले Reddit पढ़ते हैं, यूट्यूब रिव्यू चेक करते हैं और “Scams in India” सर्च करते हैं।
हमारे देश का विश्वसनीयता सूचकांक यानी Trust Index धीरे-धीरे नीचे गिर रहा है, और इसकी बड़ी वजह है –
भ्रष्टाचार, स्कैम, और प्रशासन की खामोशी।
यह ब्लॉग आपके लिए है, जो सोचते हैं कि “इतनी बड़ी चीज़ कैसे गिर सकती है?”
तो आइए, जानते हैं कैसे हम खुद ही अपने भरोसे का दीया बुझा रहे हैं।
पहला कारण: पर्यटक के लिए फुल सेटअप – स्कैम पैकेज में
आपने कभी सोचा है कि भारत आने वाले विदेशी टूरिस्ट का स्वागत कौन करता है?
कस्टम अफसर? नहीं।
टैक्सीवाला भाईसाहब, जो एयरपोर्ट से ही स्कैम शुरू कर देता है।
“सर, मैं ऑफिशियल टैक्सी हूं,” से शुरू होता है सफर जो कभी-कभी नकली गाइड, ओवरप्राइस होटल और जाली टिकट तक पहुंच जाता है।
अब जब कोई पर्यटक ₹50 की चीज़ ₹500 में खरीदता है और शिकायत करने पर सुनता है – “कुछ नहीं हो सकता”,
तो वो दोबारा भारत क्यों आएगा?
ऐसे हजारों अनुभव इंटरनेट पर मौजूद हैं – ब्लॉग्स, व्लॉग्स और ट्रिप एडवाइजर पर
जहां लोग खुलकर बताते हैं – “India is beautiful, but be careful.”
यही ‘but’ भारत के भरोसे पर सबसे बड़ा वार करता है।
दूसरा कारण: प्रशासनिक चुप्पी – “मामला देखेंगे”, पर कभी देखते नहीं
भ्रष्टाचार और उदासीनता प्रशासनिक सिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं।
जब एक टूरिस्ट पुलिस से मदद मांगता है, तो जवाब आता है – “बाद में देखेंगे, अभी व्यस्त हैं।”
चाहे वो नकली गाइड हो या बिना मीटर वाला ऑटो – सबके बारे में पुलिस को पता होता है।
पर कार्रवाई? न के बराबर।
यही कारण है कि कई इंटरनेशनल रिपोर्ट्स में भारत को low trust destination बताया जाता है।
Imagine कीजिए – अगर कोई देश अपने मेहमानों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता,
तो बाकी दुनिया उस देश को कैसे देखेगी?
Transparency International और World Economic Forum जैसे संगठनों की रिपोर्ट्स भारत के प्रशासनिक ट्रस्ट को बार-बार “poor” रेट करती हैं।
और इसका असर सिर्फ टूरिज़्म नहीं, इन्वेस्टमेंट, बिज़नेस और डिप्लोमेसी पर भी पड़ता है।
तीसरा कारण: हम खुद भी भरोसे के लायक नहीं बन पा रहे
कभी आपने सोचा कि हम आम लोग भी इसमें कहां तक ज़िम्मेदार हैं?
जब हम कहते हैं – “भाई, थोड़ा जुगाड़ करवा दो,”
या “थोड़ा एक्स्ट्रा ले लो, बस काम हो जाए”,
तो हम सिस्टम को और गहरा खराब कर रहे होते हैं।
ट्रस्ट बिल्डिंग सिर्फ गवर्नमेंट की ड्यूटी नहीं होती, ये एक कलेक्टिव कोशिश होती है।
हर नागरिक का एक छोटा-सा सही काम भी भारत के ट्रस्ट इंडेक्स को ऊपर ले जा सकता है।
आप सोचिए – अगर हर दुकानदार, गाइड, पुलिसवाला और हम-आप टूरिस्ट के साथ ईमानदारी से पेश आएं,
तो भारत की छवि कितनी जल्दी बदल सकती है।
निष्कर्ष: फिर से Incredible India बनने की ज़रूरत है
भारत के पास सब कुछ है – खूबसूरत जगहें, दिल से स्वागत करने वाले लोग, स्वादिष्ट खाना और अनोखी संस्कृति।
बस हमें अपने “trust leaks” को बंद करना है।
इसका तरीका बहुत आसान है:
- हर टूरिस्ट स्पॉट पर रेगुलेटेड गाइड सिस्टम लागू हो।
- पुलिस को टूरिस्ट फ्रेंडली ट्रेनिंग दी जाए।
- हर नागरिक को ईमानदारी का महत्व समझाया जाए।
जब तक हम खुद भरोसे के लायक नहीं बनते, तब तक दुनिया हम पर भरोसा नहीं करेगी।
और अगर हम सबने मिलकर कोशिश की,
तो एक दिन फिर से दुनिया कहेगी – “Incredible India – and this time, we really mean it!”
